गांधी जयंती: आदर्शों का राजनीतिक अपहरण या आत्ममंथन का अवसर?
हर साल 2 अक्टूबर को देश गांधी जयंती मनाता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के सत्य, अहिंसा और सरलता के आदर्शों की दुहाई दी जाती है, नेता मंचों से बड़े-बड़े भाषण देते हैं और सरकारी कार्यालयों में औपचारिक कार्यक्रम आयोजित होते हैं। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या गांधी का नाम केवल प्रतीकात्मक रह गया है? क्या उनकी विचारधारा को नेताओं ने सिर्फ़ राजनैतिक हथियार बनाकर रख दिया है? आज जब देश की राजनीति में नफ़रत, ध्रुवीकरण और सत्ता के लिए किसी भी हद तक जाने की प्रवृत्ति हावी है, तो गांधी जयंती आत्ममंथन का अवसर है या फिर यह भी राजनीतिक दिखावे का एक दिन मात्र? गांधी के नाम का राजनीतिक दुरुपयोग, लेकिन उनकी विचारधारा से दूरी। ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य महात्मा गांधी का जीवन और संघर्ष भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का नैतिक आधार था। उन्होंने सत्याग्रह, अहिंसा और स्वराज के मंत्र से करोड़ों भारतीयों को प्रेरित किया। गांधी की राजनीति सत्ता पर कब्ज़ा करने की नहीं, बल्कि जनता को सशक्त बनाने की थी। उनके लिए राजनीति का मतलब था नैतिकता और सेवा। लेकिन स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद वही गांधी आज “राजनीतिक ब्रांड” बन गए हैं। सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी गांधी के नाम का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन उनके आदर्शों को अपनाने से कतराते हैं। आज का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य 2025 की भारतीय राजनीति गांधी के आदर्शों से बिल्कुल उलट खड़ी है। गांधी बनाम गोडसे विमर्श पिछले कुछ वर्षों में गांधी की आलोचना और नाथूराम गोडसे के महिमामंडन की प्रवृत्ति बढ़ी है। सत्ता से जुड़े कुछ नेता गोडसे को “देशभक्त” कहने से भी नहीं हिचकते। यह प्रवृत्ति केवल गांधी की विरासत पर हमला नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की नींव पर चोट है। प्रतीक बनाम वास्तविकता आज गांधी का नाम हर जगह है — नोटों पर उनकी तस्वीर, स्वच्छ भारत अभियान के लोगो में उनकी छवि, सरकारी विज्ञापनों और भाषणों में उनका ज़िक्र। लेकिन असली सवाल यह है कि गांधी का वास्तविक संदेश कहाँ है? जनता की पीड़ा बनाम सत्ता का उत्सव गांधी ने कहा था कि असली भारत गाँवों में बसता है। लेकिन आज गाँव उपेक्षित हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं, मज़दूर पलायन कर रहे हैं। सत्ता के गलियारों में गांधी की मूर्तियों पर मालाएँ चढ़ाई जाती हैं, लेकिन उन्हीं की जनता भूख और बेरोज़गारी से जूझ रही है। डेटा आधारित सच्चाई विपक्ष और बुद्धिजीवियों की आलोचना विपक्षी दलों और समाजशास्त्रियों का कहना है कि सत्ता पक्ष गांधी के नाम का इस्तेमाल केवल अपनी छवि चमकाने के लिए करता है। विपक्ष यह भी आरोप लगाता है कि गांधी के विचारों का पालन करने से सरकार को डर है, क्योंकि गांधी का रास्ता सत्तालोलुपता से टकराता है। व्यंग्यात्मक दृष्टि आज हालात यह हैं कि गांधी के नाम पर छुट्टी तो मिलती है, लेकिन गांधी के सिद्धांतों पर अमल करने वाले को “देशद्रोही” या “आंदोलनकारी” कह दिया जाता है। यह वही देश है जहाँ गांधी ने अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई थी, और आज जनता जब भ्रष्टाचार या अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाती है तो उस पर मुक़दमे दर्ज होते हैं। सरकार और समर्थक यह तर्क देते हैं कि: लेकिन यह तर्क सतही हैं। यानी गांधी का नाम तो है, लेकिन उनकी आत्मा राजनीति से गायब है। गांधी जयंती हमें यह याद दिलाती है कि राष्ट्रपिता का नाम केवल नारे या प्रतीक तक सीमित नहीं होना चाहिए। गांधी का असली सम्मान तभी होगा जब राजनीति उनके सिद्धांतों को अपने व्यवहार में उतारे। आज की राजनीति गांधी के विचारों से मीलों दूर है। नफ़रत, झूठ, असमानता और दमन — यही हावी है। जनता के लिए असली Takeaway यही है: गांधी को केवल किताबों और छुट्टियों तक न सीमित करें। उनके सत्य, अहिंसा और न्याय के विचारों को अपने दैनिक जीवन और लोकतांत्रिक संघर्षों में जीवित करें। और नेताओं के लिए आख़िरी प्रहार यही —अगर गांधी का नाम लेकर आप सत्ता में हैं, तो गांधी के सिद्धांतों से भाग क्यों रहे हैं? गांधी की तस्वीरें चढ़ाने से नहीं, उनके रास्ते पर चलने से राष्ट्र मज़बूत होगा।
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