पिरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट: विकास का दिखावा या विनाश की पटकथा?
WRITTEN BY: ROHAN BHENDE पृष्ठभूमि : बिहार, जो कभी समृद्ध कृषि उत्पादन और ज्ञान-परंपरा के लिए जाना जाता था, आज ऊर्जा संकट की वजह से पिछड़ेपन और औद्योगिक ठहराव का शिकार है। राज्य की औसत बिजली खपत अब भी राष्ट्रीय औसत से कम है। उद्योग लग नहीं पा रहे, रोज़गार नहीं बन रहा और शिक्षा-स्वास्थ्य संस्थान भी स्थिर विद्युत आपूर्ति के बिना जूझ रहे हैं। ऐसे परिदृश्य में जब सरकार और कॉरपोरेट जगत मिलकर किसी बड़े पावर प्रोजेक्ट की घोषणा करते हैं, तो जनता को यह सपना दिखाया जाता है कि “अब विकास की गाड़ी दौड़ेगी, अब आत्मनिर्भरता आएगी।” भागलपुर जिले के पिरपैंती प्रखंड में प्रस्तावित 2,400 मेगावॉट का थर्मल पावर प्रोजेक्ट भी ऐसे ही सपनों के साथ जनता को बेचा जा रहा है। इसे “बिहार की ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में ऐतिहासिक कदम” कहा गया। मुख्यमंत्री से लेकर ऊर्जा मंत्री और स्थानीय नेताओं तक ने इसे “बिहार के औद्योगिक पुनर्जागरण” का प्रतीक बताया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह परियोजना वाकई विकास का मार्ग खोलेगी, या फिर यह ज़मीन, पानी, पर्यावरण और किसानों की आजीविका को निगलने वाला विनाशकारी प्रयोग साबित होगी? इतिहास गवाह है कि भारत में बड़े ऊर्जा प्रोजेक्ट अक्सर “विकास” के नाम पर शुरू हुए लेकिन परिणामस्वरूप जनता ने विस्थापन, प्रदूषण और महंगी बिजली का बोझ झेला। चाहे वह कोलार गोल्ड फ़ील्ड्स हों, कोरबा थर्मल पावर हो या झारखंड-ओडिशा की खदानों पर आधारित उद्योग – हर जगह जनता को वादों से धोखा मिला। पिरपैंती परियोजना भी इन्हीं सवालों से घिरी है: यह लेख इन्हीं प्रश्नों का गहन विश्लेषण करेगा। भूमि अधिग्रहण से लेकर तकनीकी लागत, रोजगार के वादों से लेकर निविदा प्रक्रिया, और पर्यावरणीय प्रभाव से लेकर वैकल्पिक ऊर्जा नीति तक – हर पहलू पर धारदार आलोचनात्मक दृष्टि डालेगा। भूमि अधिग्रहण और किसान सवाल किसी भी बड़े औद्योगिक प्रोजेक्ट की बुनियाद ज़मीन पर टिकती है। और भारत जैसे कृषि-प्रधान देश में ज़मीन सिर्फ़ मुनाफ़े का संसाधन नहीं, बल्कि किसानों की आजीविका, खाद्य सुरक्षा और सामाजिक अस्मिता का आधार है। पिरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट का सबसे विवादास्पद और आलोचनात्मक पहलू यही है कि इसके लिए ली गई ज़मीन किस तरह किसानों से छीनी गई और किस कीमत पर कॉरपोरेट को सौंप दी गई। ज़मीन की कीमत का अन्याय सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिरपैंती प्रोजेक्ट के लिए लगभग 1,020–1,050 एकड़ उपजाऊ कृषि भूमि अधिग्रहित की गई। यह वही भूमि है जो गंगा की गोद में बसी, अत्यंत उपजाऊ और बहु-फसली है। किसान यहाँ साल में दो से तीन फसलें निकालते रहे हैं – धान, गेहूँ, मक्का, सब्ज़ियाँ और तिलहन। अनुमान लगाया जाए तो यह ज़मीन हर साल ₹150–200 करोड़ का कृषि उत्पादन देती थी। अब सोचिए – ऐसी ज़मीन अडाणी पावर को सिर्फ़ ₹1 प्रति एकड़ प्रति वर्ष की दर से 25 साल के लिए लीज़ पर दे दी गई! यह सौदा सिर्फ़ किसानों के साथ नहीं, बल्कि पूरे बिहार के ख़ज़ाने के साथ किया गया मज़ाक है। ज़मीन की असली बाज़ार कीमत लाखों रुपये प्रति एकड़ है। इसका सीधा अर्थ है कि सरकार ने कॉरपोरेट को फायदा पहुँचाने के लिए जनता की संपत्ति औने-पौने दाम में लुटा दी। किसानों की सहमति का सवाल 2013 का भूमि अधिग्रहण कानून साफ़ कहता है कि किसी भी PPP (Public–Private Partnership) प्रोजेक्ट के लिए 80% ज़मीन मालिकों की सहमति अनिवार्य है। साथ ही Social Impact Assessment (SIA) रिपोर्ट भी तैयार करनी होती है, ताकि देखा जा सके कि समाज पर इसका क्या असर होगा। लेकिन पिरपैंती में यह सारी प्रक्रिया महज़ कागज़ों पर हुई। किसानों का आरोप है कि उनसे ज़बरदस्ती दस्तखत करवाए गए, ग्रामसभा की बैठकों को औपचारिकता बनाकर पेश किया गया, और कई जगह तो किसानों को यह तक नहीं बताया गया कि उनकी ज़मीन कहाँ और किसे दी जा रही है। किसानों के विरोध को दबाने के लिए पुलिस बल तैनात किया गया। कुछ गाँवों में तो आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज और केस तक दर्ज किए गए। सवाल उठता है कि अगर यह “विकास” है, तो फिर जनता को चुप कराने के लिए दमनकारी हथकंडे क्यों अपनाए गए? कृषि उत्पादन का नुकसान गंगा के मैदानी इलाक़े की यह ज़मीन सिर्फ़ स्थानीय किसानों के लिए ही नहीं, बल्कि बिहार की खाद्य सुरक्षा के लिए भी अहम थी। यहाँ से निकलने वाली उपज न सिर्फ़ स्थानीय बाज़ार, बल्कि भागलपुर और आसपास के शहरी इलाकों की ज़रूरतें पूरी करती थी। अब यह ज़मीन कंक्रीट और मशीनों से भर जाएगी। आने वाले सालों में इससे होने वाला नुकसान सिर्फ़ किसानों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि राज्य की खाद्य आपूर्ति और अर्थव्यवस्था पर भी असर डालेगा। एक ओर सरकार किसानों से आत्मनिर्भर कृषि का सपना दिखाती है, दूसरी ओर उन्हीं किसानों की ज़मीन उद्योगपतियों को सौंप देती है। विस्थापन और सामाजिक संकट भूमि अधिग्रहण का दूसरा पहलू है विस्थापन। प्रोजेक्ट के लिए कई गाँव आंशिक या पूर्ण रूप से प्रभावित होंगे। ज़मीन गंवाने वाले किसानों को न तो उचित मुआवज़ा मिला और न ही वैकल्पिक आजीविका का ठोस आश्वासन। किसानों को यह कहा गया कि “नौकरी मिलेगी”, लेकिन ज़मीनी सच्चाई यह है कि प्लांट बनने के बाद स्थायी नौकरियाँ सिर्फ़ 400–500 होंगी और वे भी ज़्यादातर तकनीकी प्रकृति की। यानी ग्रामीण किसानों के बच्चे, जिन्हें तकनीकी शिक्षा नहीं मिली, उनके लिए यह वादा खोखला साबित होगा। परिणाम यह होगा कि खेती से जुड़े परिवार मज़दूरी और पलायन की ओर धकेले जाएंगे। यह विस्थापन सिर्फ़ भौगोलिक नहीं होगा, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक भी होगा। गाँव की एकता, रिश्तेदारी और सामूहिक जीवनचर्या टूट जाएगी। लोकतंत्र पर धब्बा सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर जनता की सहमति और पारदर्शिता ही न हो, तो क्या इस प्रोजेक्ट को “लोकतांत्रिक विकास” कहा जा सकता है? सरकार ने जिस तरह किसानों की आवाज़ को नज़रअंदाज़ किया, वह दिखाता है कि यहाँ लोकतंत्र की नहीं, बल्कि कॉरपोरेट की जीत हुई। भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया साफ़ तौर पर किसानों और राज्य दोनों के साथ अन्याय है। उपजाऊ ज़मीन को औने-पौने दाम में कॉरपोरेट को देना विकास नहीं, बल्कि विनाश की ठोस नींव रखना है। यह प्रोजेक्ट किसानों की पीड़ा और लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना से शुरू हुआ है, तो आगे इससे “न्यायपूर्ण विकास” की उम्मीद करना मूर्खता होगी। तकनीकी–आर्थिक विश्लेषण किसी भी ऊर्जा परियोजना की असली सफलता इस बात
पिरपैंती थर्मल पावर प्रोजेक्ट: विकास का दिखावा या विनाश की पटकथा? Read More »
