अमेरिका में H-1B वीज़ा पर भारतीयों का दबदबा, लेकिन कम सैलरी वाले पदों पर ज़्यादा मंज़ूरी
अमेरिका में 2024 के H-1B वीज़ा लॉटरी के नतीजों ने एक दिलचस्प रुझान दिखाया है — हर 10 में से 8 आवेदन ऐसे कर्मचारियों के थे जिन्हें “लेवल 1” और “लेवल 2” वेतन श्रेणी में रखा गया।यह आंकड़ा दिखाता है कि भारतीय आईटी कंपनियां और टेक स्टार्टअप्स अभी भी मुख्यतः एंट्री और मिड-लेवल कर्मचारियों पर निर्भर हैं। लेवल 1 यानी Entry-Level पदों के लिए वेतन सबसे कम होता है, जबकि लेवल 2 Moderately Skilled कर्मचारियों के लिए है।इस रिपोर्ट से यह भी स्पष्ट होता है कि अमेरिकी तकनीकी क्षेत्र में भारतीय प्रतिभा का वर्चस्व कायम है, लेकिन वेतन और पेशेवर मानकों के लिहाज से असमानता बरकरार है। अमेरिकी इमिग्रेशन सिस्टम में H-1B वीज़ा को लंबे समय से “टेक टैलेंट की जीवनरेखा” माना जाता है। इस वीज़ा के तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी पेशेवरों को नियुक्त कर सकती हैं — खासकर वैज्ञानिक, इंजीनियर, डेटा एनालिस्ट, शिक्षाविद और टेक्नोलॉजी एक्सपर्ट। 2024 की लॉटरी में जो सबसे बड़ा पैटर्न सामने आया, वह यह है कि 80% से अधिक मंज़ूर आवेदन लेवल 1 और लेवल 2 कैटेगरी से जुड़े थे।संख्या के अनुसार, लेवल 1 (Entry Level): 28% आवेदन लेवल 2 (Moderately Skilled): 48% आवेदन लेवल 3 (Experienced Level): 14% आवेदन लेवल 4 (Highly Skilled/Managerial Level): मात्र 6% आवेदन यह डेटा दर्शाता है कि अधिकांश कंपनियां, विशेष रूप से भारतीय आईटी कंपनियां, लागत कम करने के लिए एंट्री और मिड-लेवल कर्मचारियों की भर्ती पर ज़ोर देती हैं। 🇮🇳 भारतीयों का बढ़ता प्रभुत्व अमेरिका के H-1B प्रोग्राम से सबसे ज़्यादा फ़ायदा भारतीय पेशेवरों को मिला है। पिछले दस वर्षों में H-1B वीज़ा धारकों में से लगभग 70% भारतीय मूल के हैं।तकनीकी कंपनियों जैसे TCS, Infosys, Wipro, HCL और Tech Mahindra ने अमेरिका में भारी संख्या में भारतीय इंजीनियरों को रोजगार दिया है। एफडब्ल्यूडी.यूएस (FWD.us) की रिपोर्ट के मुताबिक, “अमेरिका में फिलहाल लगभग 7.3 लाख H-1B वीज़ा होल्डर हैं, जिनके साथ 5.5 लाख आश्रित परिवारजन रहते हैं।” इन पेशेवरों और उनके जीवनसाथियों का अमेरिकी अर्थव्यवस्था में योगदान भी उल्लेखनीय है।रिपोर्ट के अनुसार, वे हर साल अमेरिकी अर्थव्यवस्था में 86 अरब डॉलर का प्रत्यक्ष योगदान करते हैं। फ़ेडरल और पेरोल टैक्स के रूप में 24 अरब डॉलर से अधिक का भुगतान करते हैं। 💵 वेतन और नौकरी का स्तर अमेरिकी श्रम विभाग (US Department of Labor) के मानकों के अनुसार, H-1B नौकरियों को चार वेतन स्तरों में विभाजित किया गया है: वेतन स्तर वर्गीकरण कौशल स्तर औसत वेतन (USD)Level 1 Entry-level बेसिक स्किल्स, ट्रेनिंग आवश्यक $60,000–$80,000Level 2 Intermediate कुछ अनुभव या विशेष स्किल्स $80,000–$100,000Level 3 Experienced विशेषज्ञता और लीडरशिप रोल $100,000–$130,000Level 4 Advanced/Managerial मैनेजर या उच्च विशेषज्ञ $130,000+ H-1B वीज़ा की अधिकतर मंजूरियाँ लेवल 1 और 2 में होने का मतलब यह है कि कंपनियां अब भी “कॉस्ट-इफिशिएंट हायरिंग” की रणनीति पर चल रही हैं। ⚙️ भारतीय कंपनियों का मॉडल अधिकांश भारतीय आईटी कंपनियां अपने अमेरिकी प्रोजेक्ट्स के लिए “ऑफशोर-ऑनशोर” मॉडल अपनाती हैं — यानी भारत में कोर डेवलपमेंट होता है और अमेरिका में क्लाइंट-सपोर्ट या इम्प्लिमेंटेशन टीम होती है।इन ऑनशोर कर्मचारियों को प्रायः लेवल 2 के तहत नियुक्त किया जाता है, जिससे कंपनियों को लागत में भारी बचत होती है। अमेरिकी श्रम विभाग के अनुसार, इन कंपनियों द्वारा दिया गया औसत वेतन स्थानीय मीडियन सैलरी से 10–20% तक कम होता है।विशेषज्ञों का कहना है कि यही वजह है कि H-1B वीज़ा अक्सर अमेरिकी राजनीति में विवाद का कारण बनता है। 🇺🇸 ट्रंप का नया आदेश 19 सितंबर को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नया आदेश जारी किया, जिसके तहत H-1B आवेदन शुल्क को $1,00,000 (लगभग ₹88 लाख) तक बढ़ा दिया गया।व्हाइट हाउस के बयान के अनुसार, “यह नीति अमेरिकी नागरिकों के लिए नौकरियों की रक्षा करने के उद्देश्य से है।” ट्रंप प्रशासन का मानना है कि विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने से अमेरिकी नागरिकों की नौकरियाँ छिनती हैं।हालांकि, उद्योग जगत और टेक कंपनियों ने इसे “इनोवेशन पर हमला” बताया है। सिलिकॉन वैली स्थित टेक एसोसिएशन NASSCOM का कहना है कि इस तरह के निर्णय से “टैलेंट पाइपलाइन टूट जाएगी और अमेरिका की प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त घटेगी।” H-1B धारक सिर्फ टेक कंपनियों तक सीमित नहीं हैं। वे अमेरिकी विश्वविद्यालयों, स्वास्थ्य सेवा, वित्तीय संस्थानों और शिक्षा क्षेत्र में भी अहम भूमिका निभाते हैं।अमेरिकी कांग्रेसनल रिसर्च सर्विस (CRS) की रिपोर्ट बताती है कि H-1B पेशेवरों की उपस्थिति ने “इनोवेशन और उत्पादकता में औसतन 2% सालाना वृद्धि” दर्ज कराई है। लेकिन, नए नीतिगत बदलावों से यह प्रवृत्ति प्रभावित हो सकती है। अमेरिका की H-1B नीति अब दोहरे दबाव में है — एक ओर देश की कंपनियों को विदेशी स्किल्स की ज़रूरत है, और दूसरी ओर राजनीतिक दबाव है कि “अमेरिकी नौकरियाँ अमेरिकी नागरिकों के लिए” सुरक्षित रखी जाएं। 2024 के आंकड़े साफ़ दिखाते हैं कि भारतीय पेशेवरों की मौजूदगी अमेरिका की तकनीकी रीढ़ बन चुकी है।हालांकि, जिस अनुपात में भारतीयों का योगदान बढ़ा है, उसी अनुपात में उनकी वेतन श्रेणी और स्थायी पदों में भागीदारी नहीं बढ़ पाई है।इससे यह बहस और तेज़ हुई है कि क्या भारत की आईटी कंपनियाँ सस्ते श्रम के निर्यातक बन चुकी हैं या वैश्विक स्किल्स की आपूर्ति श्रृंखला का स्तंभ। राजनीतिक दृष्टि से ट्रंप प्रशासन के आदेश भारत-अमेरिका व्यापार संबंधों पर असर डाल सकते हैं, खासकर तब जब अमेरिका भारतीय प्रतिभा पर तकनीकी रूप से निर्भर है। 2024 की H-1B लॉटरी ने यह स्पष्ट किया है कि भारतीय पेशेवर अमेरिकी टेक सेक्टर की रीढ़ हैं, लेकिन उन्हें अब भी निचले वेतन स्तरों पर रखा जा रहा है।ट्रंप का नया आदेश और बढ़ी हुई फीस इन कर्मचारियों के लिए मुश्किलें बढ़ा सकता है।फिलहाल अमेरिका में “टैलेंट बनाम ट्रेड” की बहस फिर से तेज़ हो चुकी है — और इसका असर भारत-अमेरिका के तकनीकी रिश्तों पर लंबे समय तक पड़ सकता है।
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